गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़ी UPSC पास कर कैसे बनीं IAS अफसर

परिवार के अन्य बच्चों की तरह गांव के सरकारी स्कूल में सुरभि का भी दाखिला हुआ। वह हिंदी माध्यम स्कूल था। शुरू से ही सुरभि कमाल करती रहीं, मगर परिवार के ज्यादातर सदस्यों के लिए यह कोई खास बात नहीं थी। मध्य प्रदेश बोर्ड के स्कूलों में पांचवीं में भी बोर्ड परीक्षा होती है। 

परिणाम आने पर टीचर ने सुरभि को बुलाया और पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘आपको गणित में शत-प्रतिशत अंक मिले हैं। मैंने बोर्ड परीक्षा में आज तक किसी को सौ में सौ पाते नहीं देखा। दसवीं बोर्ड में उन्हें न सिर्फ गणित, बल्कि विज्ञान में भी शत-प्रतिशत अंक मिले। उन्हें राज्य के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों में गिना गया। अखबारों में उनके इंटरव्यू छपे।

एक पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि आगे क्या करियर चुनेंगी, तो सुरभि को समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दें, क्योंकि इसके बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था। जब पत्रकार ने दोबारा पूछा, तब उनके मुंह से बेसाख्ता निकल आया- बड़ी होकर मैं जिला कलक्टर बनना चाहती हूं। अखबार में खबर छपी- कलक्टर बनना चाहती हैं सुरभि! इस शीर्षक ने सुरभि के हृदय को छू लिया था

वह तो अंग्रेजी बिल्कुल नहीं बोल सकती थीं। किसी तरह पूर्व के साथियों के शब्दों को जोड़-तोड़कर उन्होंने अपना परिचय तो दे दिया, मगर प्रोफेसर ने उसी वक्त उनसे भौतिकी का एक सवाल पूछ लिया- ‘टेल मी द डेफिनिशन ऑफ पोटेंशियल।’ सुरभि खामोश खड़ी रहीं। प्रोफेसर ने हैरानी से कहा- ‘आप वाकई 12वीं पास करके आई हैं? आपको एक बेसिक सवाल का उत्तर नहीं पता?’

यहां समस्या भौतिकी नहीं, अंग्रेजी थी। हॉस्टल के अपने कमरे में फूट-फूटकर रोने के बाद सुरभि ने मां-पापा को फोन कर घर लौटने की इच्छा जताई। तब पिता ने कहा- आ सकती हो। लेकिन यह याद रखना, ऐसा करके आप गांव की अन्य लड़कियों के लिए भी दरवाजा बंद कर रही हो। सुरभि को बात लग गई। उन्होंने तय कर लिया कि इस सेमेस्टर के अंत तक वह धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर रहेंगी,

और पहले सेमेस्टर में वह न सिर्फ कॉलेज, बल्कि पूरी यूनिवर्सिटी की टॉपर रहीं सुरभि का सपना आईएएस अफसर बनने का था। 2016 की सिविल सर्विस परीक्षा में पहले प्रयास में 50वीं रैंक पाने वाली सुरभि कहती हैं- कोई भाषा दीवार नहीं होती, ठान लीजिए तो वह आपके अधिकार में होगी।