जम्मू कश्मीर के संबंध मेँ विशेष प्रावधान  FOR UPSC IN HINDI

ऐतिहासिकपृष्ठभूमि

  • महाराज हरी सिंह (जम्मूकश्मीर के भूतपूर्व शासक) द्वारा 22 अक्टूबर, 1947 को भारत के साथ निष्पादित अंगीकार पत्र की शर्तें इस प्रकार थीं-
  1. जम्मू कश्मीर ने भारत को केवल 4 विषय समर्पित किए – विदेशी संबंधी कार्य, मुद्रा, संचार एवं प्रतिरक्षा।
  2. जम्मू कश्मीर की संविधान सभा द्वारा जम्मू कश्मीर के लिए एक अलग संविधान बनाया जाएगा।
  3. जम्मू कश्मीर मेँ संपत्ति का अधिकार सिर्फ जम्मू कश्मीर के नागरिकोँ को प्राप्त होगा होगा।
  4. सामान्य स्थिति बहाल हो जाने के बाद भारत मेँ विलय के बारे मेँ जम्मू कश्मीर के लोगों की राय जानने के लिए एक जनमत संग्रह कराया जाएगा।
  • अनुच्छेद 370 कहता है कि संविधान का अनुच्छेद-1, जम्मू कश्मीर के लिए लागू होगा, अर्थात जम्मू कश्मीर को भारत से अलग होने का अधिकार नहीँ है।
  • अनुच्छेद 370 मेँ यह प्रावधान है कि, जम्मू कश्मीर विधान मंडल की संस्तुति के बाद भारत का राष्ट्रपति एक या अधिक राज्य विषय केंद्र को हस्तांतरित कर सकता है। इस प्रकार बहुत सारे विषय, केंद्र को हस्तांतरित किए जा चुके हैं।
  • अनुच्छेद 370 का, भारत के संविधान मेँ लाना, जम्मू कश्मीर के संविधान सभा के अनुसमर्थन के अधीन हो चुका है अतः जम्मू कश्मीर के लोगों ने स्वयं निर्धारण का अपना अधिकार खो दिया है।
  • राज्य का अपना पृथक संविधान है। इसका निहित अभिप्राय यह भी है कि द्वैध नागरिकता का सिद्धांत।
Constitution of Parliament
  • अन्य राज्योँ के विपरीत अवशिष्ट शक्तियां संसद के पास न होकर जम्मू कश्मीर की विधायिका मेँ निहित है।
  • सिर्फ युद्ध या वाह्य आक्रमण के आधार पर उद्घोषित राष्ट्रीय आपात ही जम्मू कश्मीर राज्य पर स्वतः विस्तारित होगा।

अर्थात स्वतः विद्रोह के आधार पर उद्घोषित राष्ट्रीय आपात स्वतः जम्मू कश्मीर पर लागू नहीँ होगा।

  • राज्य का राज्यपाल जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के परामर्श के बाद ही नियुक्त किया जा सकता है।
  • संसद को किसी भी दशा मेँ 7वीँ अनुसूची के तहत राज्य सूची के किसी भी विषय पर जम्मू कश्मीर के लिए विधि बनाने की शक्ति नहीँ होगी।
  • राज्य मेँ अनुच्छेद 360 के तहत, वित्तीय आपात नहीँ लगाया जा सकता है।
  • राष्ट्रपति शासन के अलावा राज्यपाल का शासन भी जम्मू कश्मीर मेँ अधिकतम 6 माह के लिए लगाया जा सकता है।
  • संसद के निवारक निरोध अनुच्छेद 22, संबंधी कानून भी स्वतः जम्मू कश्मीर पर लागू नहीँ होते।
  • जम्मू कश्मीर राज्य का नाम, सीमा व क्षेत्र मेँ राज्य विधायका की संपत्ति के बिना संसद कोई परिवर्तन नहीँ कर सकती।
  • संविधान का अनुच्छेद 19 (च) तथा 31 (2) जम्मू-कश्मीर राज्य के सन्दर्भ में निरसित नहीं किये गए हैं। अर्थात अभि भी उस राज्य के नागरिकों को संपत्ति का अधिकार प्राप्त है।

दिल्लीसमझौता

  • 1952 मेँ पंडित नेहरु और शेख अब्दुल्ला के मध्य हुआ, जिसको 1953 मेँ क्रियान्वित किया गया। इसके अनुसार जम्मू-कश्मीर मेँ अपनी बहुत सारी शक्तियां केंद्र को समर्पित कर दी, जैसे-
  1. भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक, भारत के उच्चतम न्यायालय और भारत के निर्वाचन आयोग की अधिकारिता को जम्मू कश्मीर तक विस्तारित कर दिया गया।
  2. अनुच्छेद 356 को जम्मू कश्मीर तक विस्तारित किया गया।
  3. अनुच्छेद 22 के तहत, राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित निवारक निरोध कानून, राज्य विधान सभा की सहमति से जम्मू कश्मीर मेँ विस्तारित किए जा सकते थे।
  4. राज्य के प्रधान का पदनाम सदर-ए-रियासत से राज्यपाल और सरकार के प्रधान का पदनाम वजीर-ए-आजम से मुख्यमंत्री मेँ बदल दिया गया।
  • राज्यपाल, विधान सभा द्वारा निर्वाचित नहीँ बल्कि राष्ट्रपति द्वारा मुख्यमंत्री के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा।
  • वर्तमान मेँ जम्मू कश्मीर की विशेष शक्तियां (जो अन्य राज्य को उपलब्ध नहीँ है)
  • एक अलग संविधान-दोहरी नागरिकता।
  • राज्य मेँ संपत्ति का अधिकार केवल जम्मू कश्मीर के नागरिकोँ को ही उपलब्ध है।
  • केवल जम्मू कश्मीर के नागरिक ही, राज्य विधान मंडल के चुनाव मेँ भाग ले सकते हैं। भारत के नागरिक (जो जम्मू-कश्मीर मेँ सेवारत) हैँ केवल लोकसभा चुनाव मेँ भाग ले सकते हैं।
  • जम्मू कश्मीर का राज्यपाल, राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श के बाद ही नियुक्त किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 3, जम्मू-कश्मीर के लिए लागू नहीँ होता है जम्मू कश्मीर का राज्य क्षेत्र अविघतनकारी है।
  • अवशिष्ट सूची (residual list) जम्मू-कश्मीर के पास है, भारतीय संघ के पास नहीँ।
  • अनुच्छेद 249, जम्मू-कश्मीर मेँ लागू नहीँ होता है। संसद, राष्ट्रपति शासन या राष्ट्रीय आपात स्थिति को छोडकर अन्य समय मेँ, राज्य सूची के किसी विषय पर विधान नहीँ बना सकता है।
  • अनुच्छेद-352 केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर लगाए गए राष्ट्रीय आपात का ही, जम्मू कश्मीर मेँ स्वतः विस्तार हो सकता है, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर लगाए गए आपात का नहीँ।
  • अनुच्छेद-22 निवारक निरोध के तहत बनाई गई विधि, जम्मू-कश्मीर मेँ स्वतः लागू नहीँ होगी। संसद को इसके लिए एक अलग व्यक्तव्य देना होगा।

जम्मूकश्मीरराज्यस्वायत्ततासंकल्प

अनुच्छेद 370 ख़त्म: कश्मीर मुद्दे का कहाँ तक हल है? - यूपीएससी, आईएएस,  सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी | ध्येय IAS® - Best  UPSC ...
  • जम्मू कश्मीर को ज्यादा स्वायत्तता देने के उपायों की संस्तुति देने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक राज्य स्वायत्तता समिति गठित की थी।  इस समिति ने बहुत व्यापक संस्तुतियां दीं, जिसे राज्य विधानमंडल ने जून 2000 मेँ अनुमोदित कर दिया। राज्य विधानमंडल यह मांग की कि, केंद्र इस प्रतिवेदन को स्वीकार कर ले, जो संसद और संघीय मंत्रिमंडल ने अस्वीकार कर दिया है।
  • प्रतिवेदन की संस्तुतियां निम्नलिखित हैं और वे अधिकांशतः 1953 से पहले की स्थिति बहाल करना चाहती हैं।
  • अनुछेद 370 मेँ ‘अस्थाई शब्द’ के स्थान पर ‘विशेष’ लिखा जाए।
  • केवल प्रतिरक्षा, विदेश कार्य, मुद्रा, संचार एवं सहयोगी विषय केंद्र के पास होने चाहिए, अन्य सभी विषयों को  राज्य को हस्तानांतरित कर देना चाहिए।
  • भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, उच्चतम यायालय और चुनाव आयोग की अधिकारिता राज्य से वापस ले ली जाए।
  • अनुच्छेद 356, जम्मू-कश्मीर मेँ लागू नहीँ होना चाहिए।
  • केवल युद्ध के आधार पर उद्घोषित आपात जम्मू कश्मीर मेँ स्वतः विस्तारित होना चाहिए।
  • राज्यपाल और मुख्यमंत्री का पहले वाले पदनाम वापस लाया जाए।
  • राज्य का राज्यपाल, राज्य विधान सभा द्वारा निर्वाचित किया जाए।
  • जम्मू कश्मीर से अखिल भारतीय सेवाओं को समाप्त किया जाए।
  • जम्मू कश्मीर के मामले मेँ संसद और राष्ट्रपति की भूमिका निर्बंधित (या सीमित) की जाए।
  • अपील करने के लिए विशेष इजाजत प्रदान करने के लिए उच्चतम न्यायालय के अधिकार को जम्मू कश्मीर के मामले मेँ वापस लिया जाए।
  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गो के लिए विशेष उपबंध जम्मू कश्मीर मेँ लागू नहीँ होंगें।
  • जम्मू कश्मीर के मामले मेँ केंद्र को अन्तर्राज्यीय नदियों के विवादों के ऊपर न्याय निर्णयन का अधिकार नहीँ होगा।
  • जम्मू कश्मीर के लिए मूल अधिकारोँ के ऊपर एक विशेष अध्याय होगा।
  • जम्मू कश्मीर उच्च नयायालय द्वारा सुनी हुई सिविल एवं आपराधिक मामलोँ मेँ उच्चतम न्यायालय की अपीली अधिकारिता को वापस लिया जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *