विजयनगर FOR UPSC IN HINDI

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास

विजयनगर साम्राज्य का इतिहास नीचे दिया गया है-

  • भारत का मध्यकालीन इतिहास 8वीं से 12वीं सदी तक माना जाता है। इस काल में पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट से लेकर शक्तिशाली दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य स्थापित हुए। वर्तमान भारत के विकास में मध्यकालीन भारत का इतिहास बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है मध्यकालीन भारत के इतिहास का वर्तमान भारत के विकास में बहुत बड़ा योगदान है इस दौर में भारत ने भवन निर्माण कला चित्रकला धर्म भाषा और साहित्य के क्षेत्र में बहुत विकास किया था।
  • विजयनगर साम्राज्य जो कि दक्षिण भारत एक शक्तिशाली साम्राज्य था। इसकी स्थापना दो भाइयों राजकुमार हरिहर और बुक्का द्वारा 1336 ईस्वी में की गई। जल्‍दी ही उन्होंने अपने राज्य का विस्तार उत्तर दिशा में कृष्णा नदी तथा दक्षिण में कावेरी नदी के बीच वाले क्षेत्र पर कर लिया और इस पूरे क्षेत्र पर अपना राज्‍य स्थापित कर लिया। विजयनगर साम्राज्य की बढ़ती ताकत से कई शक्तियों के बीच टकराव हुआ और उन्‍होंने बहमनी साम्राज्य के साथ कई बार लड़ाइयां लड़ी। दक्षिण भारत में  मुस्लिम बार-बार ढक्कन के हिंदू राज्य पर हमला करके वहां के शासकों को पराजित कर रहे थे। होयसाल साम्राज्य (जो 14वीं शताब्दी से पहले शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था तथा जो अंतिम मुस्लिम साम्राज्य था) के राजा की मृत्यु के पश्चात इस साम्राज्य का विलय विजयनगर साम्राज्य में हो गया था।
  •  हरिहर प्रथम को पूर्वी और पश्चिमी समुद्र के प्रमुख के रूप में जाना जाता था जिसनें विजयनगर साम्राज्य की मजबूत नींव रखी थी और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में चारों ओर प्रमुख क्षेत्रों पर अपने शासन को मजबूत कर लिया था। बुक्का राय प्रथम ने आर्कोट, कोडावीडु के रेड्डी बंधु,मदुरै के सुल्तान प्रमुखों को हराकर न केवल अपने साम्राज्य का पश्चिम में बल्कि तुंगभंद्रा-कृष्णा नदी के उत्तर तक विस्तार किया और उसका उत्तराधिकारी बना। अनेगोंडी (वर्तमान में कर्नाटक) में साम्राज्य की राजधानी स्थापित की गयी जिसे बाद में विजयनगर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से साम्राज्य को इसका नाम प्राप्त हुआ था।
  • अपनी इसी क्षमता के साथ विजयनगर साम्राज्य प्रमुख रूप से दक्षिणी भारत तक फैल गया था उसका उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय (बुक्का राय प्रथम का दूसरा पुत्र) था जिसने आगे चलकर अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का पूरे दक्षिण क्षेत्र में विस्तार किया। इसके बाद साम्राज्य को देव राय प्रथम द्वारा संगठित किया गया जिसने ओड़िशा के गज पतियों को हराया और साम्राज्य की सिंचाई और दुर्ग निर्माण के प्रमुख कार्यों को क्रियान्वित किया इसके बाद देव राय द्वितीय गद्दी पर बैठा जिसे संगम राजवंश का सबसे शक्तिशाली और सफल शासक के रूप में जाना जाता है। सामंती शासन की वजह आंतरिक अस्थिरता की लड़ाई रही थी। उसने श्रीलंका द्वीप पर भी आक्रमण किया और बर्मा साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।1336 ई. में स्थापित इस साम्राज्य के प्रथम वंश का नाम पिता के नाम पर संगम वंश पडा। इस साम्राज्य के चार राजवंशों ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया। विजयनगर साम्राज्य की राजधानियां क्रमशः: अनेगुंडी, विजयनगर, बेन गोण्डा तथा चंदगिरि। हम्पी (हस्तिनावती) विजयनगर की पुरानी राजधानी का प्रतिनिधित्व करता है। विजयनगर का वर्तमान नाम हम्पी (हस्तिनावती) है।
  • विजयनगर साम्राज्य के सबसे प्रसिद्ध राजा कृष्‍ण देव राय थे। विजयनगर का राजवंश उनके कार्यकाल में भव्यता के शिखर पर पहुंच गया। वे उन सभी लड़ाइयों में सफल रहे जो उन्‍होंने लड़ी। उन्होंने ओडिशा के राजा को पराजित किया और विजयवाड़ा तथा राजमहेन्द्री को जोड़ा।

विजयनगर के राजवंश

विजयनगर साम्राज्य पर जिन राजवंशों ने शासन किया, वे निम्नलिखित हैं-

  1. संगम वंश – 1336-1485 ई.
  2. सालुव वंश – 1485-1505 ई.
  3. तुलुव वंश – 1505-1570 ई.
  4. अरविडु वंश – 1570-1650 ई.

आर्थिक अवस्था: विजयनगर साम्राज्य

भू-राजस्व प्रशासन- राजस्व नगद और उपज दोनों में वसूल किया जाता था। नगद राजस्व को सिद्धदाय कहा जाता था। भू-राजस्व से सम्बंधित विभाग अठनवे विभाग कहलाता था और भू-राजस्व को शिष्ट कहा जाता था। विजयनगर साम्राज्य में विभेदकारी कर पद्धति प्रचलित थी। जमीनो को कई भागों में विभाजित किया जाता था, यथा भीगी जमीन, सूखी जमीन और वन एवं जंगल। भू-राजस्व की राशि उपज के 1/6 भाग से 1/3 भाग तक निर्धारित थी। ब्राह्मणों को उत्पादन का 1/20 भाग कर के रूप में देना पड़ता था और मंदिरो को 1/30 भाग देना पड़ता था। सैनिक विभाग को कन्दाचार कहा जाता था और उसके प्रमुख महादण्डनायक कहलाते थे। न्यायालय चार प्रकार के होते थे- 1. तिस्ठिता 2. चल 3. मुद्रिता और 4. शास्त्रिता। कानून के सम्बन्ध में याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति पर माधव का टीका महत्त्वपूर्ण ग्रंथ था।

भू-राजस्व कर के अतिरिक्त व्यवसायों एवं मकानों पर भी कर लगते थे। राजमहल की सुरक्षा से सम्बन्धित अधिकारी कवलकरस था। वह नायको के अन्दर कार्य करता था। कभी-कभी पुलिस के अधिकारों को बेच दिया जाता था जिसे पदिकावल कहा जाता था। पुलिस कर को अरसुस्वतंत्रम् कहा जाता था।

विदेशी विवरणों एव अन्य साधनों से भी यह स्पष्ट है कि विजयनगर साम्राज्य में असीम समृद्धि थी। राज्य के विभिन्न भागों में खेती उन्नति पर थी तथा राज्य सिंचाई की एक बुद्धिमत्तापूर्ण नीति का अनुसरण करता था। भूमि अधिकार के एक श्रेणी के अन्तर्गत सिंचाई में पूंजी निवेश के द्वारा आय प्राप्त की जाती थी। तमिल क्षेत्र में इसे दशवन्दा एवं आन्ध्र तथा कर्नाटक में कटट्कोडर्गे कहा जाता था। ग्राम में कुछ विशेष सेवाओं के बदले भूमि प्रदान की जाती थी, ऐसी भूमि को उबलि कहा जाता था। युद्ध में मारे को दी गयी भूमि को रत्तकोडगै कहलाती थी। पट्टे पर ली गयी कुट्टगि कहा जाता था। भू-स्वामी एवं पट्टेदार के बीच उपज की हिस्सेदारी को वारम कहा जाता था। कृषक मजदूर कुदि कहलाते थे। कभी-कभी खरीद बिक्री के साथ कृषक मजदूर भी हस्तांतरित कर दिये जाते थे।

विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था। मालावर तट पर सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था। अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, सम्पूर्ण साम्राज्य में 300 बंदरगाह थे। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, शोरा, लोहा, चीनी एवं मशालें। साम्राज्य में आयात की मुख्य वस्तुएँ घोडे, मुक्ता, ताँबा, मुंगा, पारा, चीनी, रेशम और मखमल। बारबोसा के अनुसार दक्षिण भारत के जहाज मालद्वीप में बनते थे।

अब्दुर्र रज्जाक के अनुसार, चुंगीघर के आफीसर व्यापारिक सामानों की देख-रेख करते थे और बिक्री पर 40वाँ हिस्सा कर के रूप में लेते थे। मलक्का के साथ काली मिर्च का अच्छा व्यापार था। इतालवी यात्री बार्थेमा (1505 ई.) के अनुसार कैम्बे के निकट बहुत बड़े परिमाण में सूती वस्त्र बनते थे और हर साल सूती और सिल्क वस्त्र से लादे हुए 40 या 50 जहाज विभिन्न देशों में भेजे जाते थे। विजयनगर साम्राज्य में सिक्के बनाने के लिए तीन प्रकार के धातु प्रयुक्त होते थे- सोना, चाँदी और ताँबा। अब्बदुर रज्जाक भी शाही टकसाल का उल्लेख करता है।

सोने के सिक्के बराह और पेरदा कहलाते थे जबकि मिश्रित धातु (सोना और चाँदी) परतब (वराह का आधा), फनम (परतब का आधा हिस्सा) कहलाते थे। इन सब सिक्कों में फनम सबसे ज्यादा उपयोगी था। चाँदी का सिक्का टार (फनम का छठा हिस्सा) था और ताँबे का सिक्का डिजटेल कहलाता था।

विदेशी व्यापार में वस्तु विनिमय की अपेक्षा मुद्रा की अधिक आवश्यकता थी। विजयनगर साम्राज्य में अनेक टकसाले थीं तथा प्रत्येक प्रांतीय राजधानी की अपनी टकसाल होती थी। स्थानीय मुद्राओं के अतिरिक्त तटीय क्षेत्रों में विदेशी मुद्रा भी प्रचलित थी-जैसे पुर्तगाली मुद्रा कुज्रेडो, फारसी-दीनार, इटली का फ्लोरीन तथा दुकत।

ग्रामीण विकास में मंदिरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। मंदिर कृषि और व्यापार के अतिरिक्त सूद पर भी रुपये देते थे। ऋण पर ब्याज की दर 12 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक वार्षिक होता था। जब कर्जदार ऋण नहीं चुका पाता था तो उसकी भूमि मंदिर की हो जाती थी। मंदिर ही बंजर भूमि खरीद कर और उस पर जुलाहों को बसा कर अथवा सिंचाई योजनाओं का निरीक्षण कर ग्राम विकास को प्रोत्साहन देते थे।

प्रमुख व्यवसाय बुने हुए कपड़ों, खानों की खुदाई तथा धातुशोधनविद्या से सम्बन्धित थे तथा छोटे व्यवसायों में सबसे महत्वपूर्ण गंधी का पेशा था। राज्य के आर्थिक जीवन में शिल्पियों एवं व्यापारियों के संघों का एक महत्वपूर्ण भाग था। अब्दुर्रज्जाक लिखता है- प्रत्येक पृथक संघ अथवा शिल्प के व्यापारियों की दुकानें एक दूसरे के निकट हैं। पीज भी कहता है- प्रत्येक गली में मंदिर है, क्योंकि ये (मंदिर) सभी शिल्पियों तथा व्यापारियों की संस्थाओं (से संस्थाएँ हम लोगों के देश के गिल्ड के समान होती हैं जिन्हें आप जानते हैं) के होते हैं। राज्य की आर्थिक अवस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता थी देश के भीतर का, तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार। मालाबार तट पर सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कालीकट था तथा अबुर्रज्जाक के लेखानुसार साम्राज्य में तीन सौ बन्दरगाह थे। इसका भारत-महासागर के द्वीपों, मलय द्वीपपुज, बर्मा, चीन, अरब, फारस, दक्षिण अफ्रीका, अबिसीनिया एवं पुर्तगाल के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़ा, चावल, लोहा, शोरा, चीनी एवं मसाले थे। साम्राज्य के आयात घोडे, हाथी, मुक्ताएँ, ताम्बा, मूंगा, पारा, चीनी, रेशम एवं मखमल थे। देश के आन्तरिक व्यापार के लिए यातायात के सस्ते साधन कावडी, सिर पर बोझ ढोने वाले, लद्दू घोडे, लददू बैल, गाड़ियाँ एवं गधे थे। तटवर्ती एवं सामुद्रिक व्यापार के लिए जहाजों का व्यवहार किया जाता था। बारबोसा के लेखानुसार दक्षिण भारत के जहाज मालदीप द्वीपों में बनते थे। अभिलेख-सम्बन्धी प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि विजयनगर के शासक जहाजी बेड़े रखते थे तथा पुर्तगीजों के आगमन के पहले वहाँ के लोग जहाज-निर्माण कला से परिचित थे। पर हम लोगों को इस बात का कोई निश्चित ज्ञान नहीं है कि किस प्रकार विजयनगर-साम्राज्य समुद्री यातायात के महत्वपूर्ण प्रश्न को हल करता था।

विजयनगर-साम्राज्य के सिक्के विभिन्न प्रकार के होते थे। ये सोने और ताँबे दोनों के थे चाँदी के सिक्के का एक ही नमूना था। सिक्के पर विभिन्न देवताओं एवं पशुओं के प्रतीक रहते थे, जो शासकों के धार्मिक विश्वास के अनुसार बदलते रहते थे। वस्तुओं के मूल्य कम थे। विदेशी यात्रियों के विवरणों से हमें मालूम होता है कि उच्च वर्ग के लोगों के रहने का स्तर ऊँचा था। पर अभिलेखों से हम जानते हैं कि साधारण जनता भारी करों के बोझ से कराह रही थी, जो स्थानीय शासकों द्वारा कड़ाई से वसूले जाते थे। कभी-कभी सर्वोच्च शासक इन स्थानीय शासकों पर प्रतिबन्ध लगाते थे।

सामाजिक जीवन: विजयनगर साम्राज्य

विदेशी यात्रियों के विवरणों, अभिलेखों तथा साहित्य में विजयनगर-साम्राज्य के लोगों के सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के संकेत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, जिनमें हम यहाँ केवल अधिक महत्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन कर सकते हैं।

स्त्रियों का सामान्यत: समाज में ऊँचा स्थान था तथा देश के राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक जीवन में उनके सक्रिय भाग लेने के दृष्टान्त दुष्प्राप्त नहीं हैं। कुश्ती लड़ने, तलवार एवं ढाल चलाने तथा संगीत एवं अन्य ललित कलाओं में प्रशिक्षित होने के अतिरिक्त कम-से-कम कुछ स्त्रियों को अच्छी साहित्यिक शिक्षा दी जाती थी। नूनिज लिखता है- उसके (विजयनगर के राजा के) पास मल्ल युद्ध करने वाली, ज्योतिष-विद्या जानने वाली एवं भविष्यवाणी करने वाली स्त्रियाँ भी हैं। उसके पास ऐसी स्त्रियाँ हैं, जो फाटकों के अन्दर किये गये खचों का पूरा हिसाब लिखती हैं। अन्य स्त्रियाँ भी हैं, जिनका कर्तव्य है राज्य के कार्यों को लिखना तथा अपनी पुस्तकों की बाहरी लेखकों की पुस्तकों से तुलना करना। उसके पास संगीत के लिएं भी स्त्रियाँ है, जो वाद्य बजाती तथा गाती हैं। राजा की पत्नियाँ तक संगीत में दक्ष हैं। ……कहा जाता है कि उसके पास न्यायाधीश एवं नाजिर हैं और पहरेदार भी हैं, जो हर रात राजमहल में पहरा देते हैं तथा ये स्त्रियाँ हैं। पत्नियों की अनेकता विशेष रूप से धनी वगों में प्रचलित प्रथा थी। बाल-विवाह सामान्य रीति थी। सामाजिक जीवन में सम्भ्रान्त लोगों में अत्यधिक दहेज ऐठने की कुप्रथा उग्र रूप में प्रचलित थी। विभिन्न सम्प्रदायों में झगड़ों को सुलझाने के लिए कभी-कभी राज्य सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप किया करता था। सती-प्रथा विजयनगर में बहुत प्रचलित थी तथा ब्राह्मण स्वच्छन्दता से इसके लिए अनुमति देते थे।

शासकों से उच्च सम्मान पाने के कारण ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण प्रभाव केवल सामाजिक एवं धार्मिक बातों में ही नहीं, बल्कि राज्य के राजनैतिक मामलों में भी था। नूनिज उनका वर्णन- ईमानदार, व्यापार में संलग्न, बहुत चतुर, अत्यंत मेधावी, हिसाब-किताब में परम दक्ष, दुबले-पतले तथा सुगठित, पर कठिन कार्य के अयोग्य व्यक्तियों के रूप में करता है।

भोजन के मामलों में कड़े प्रतिबन्ध नहीं थे। फलों, सब्जियों तथा तेल के अतिरिक्त, साधारण लोग बैलों एवं गायों का, जिनके लिए लोगों में बड़ी श्रद्धा थी, मांस छोड़ कर, सभी प्रकार के मांस खाते थे। पर ब्राह्मण किसी जीवित वस्तु को कभी मारते अथवा खाते नहीं थे। नूनिज विजयनगर के राजाओं के भोजन का विवरण इस प्रकार देता है-

विसनग (विजयनगर) के ये राजा हर प्रकार की वस्तु खाते हैं, पर बैलों अथवा गायों का मांस नहीं। इन्हें वे कभी नहीं मारते क्योंकि वे इनकी पूजा करते हैं। वे भेड़ का मांस, सूअर का मांस, हरिण का मांस, तीतर, खरगोश, पंडुक, बटेरें तथा सब तरह की चिड़ियाँ-यहाँ तक कि गौरैया, चूहे, बिल्लियाँ तथा छिपकलियाँ भी खाते हैं। ये सभी चीजें, विसनग (विजयनगर) शहर के बाजार में बिकती है। हर चीज को जीवित बेचना पड़ता है, ताकि हरेक आदमी यह जान सके कि वह क्या खरीद रहा है। यह बात कम-से-कम आखेट के जानवरों और पक्षियों के साथ है। नदियों से मछलियाँ भी अधिक परिमाण में आती हैं।

डाक्टर स्मिथ लिखते हैं कि यदि पीज एवं नूनिज के विवरण सत्य हों, तो यह राजकुमारों तथा लोगों के लिए एक विचित्र भोजन-तालिका थी, जो कृष्णदेवराय एवं अच्युत राय के समय में कट्टर हिन्दू थे तथा विष्णु के कुछ रूपों के प्रति विशेष भक्ति रखते थे। अधिक सम्भावना यह है कि चूहे, बिल्लियाँ तथा छिपकलियाँ समाज के निम्न वर्ग के लोग खाते थे, जो विजयनगर के जन-समाज के अनार्य तत्त्व थे।

विदेशी यात्री राज्य में बहुत से बलिदानों का वर्णन करते हैं। पीज के लेखानुसार राजा चौबीस भैसों और डेढ़ सौ भेड़ों का बलिदान होते देखा करता था, जिसमें एक बड़े हँसुए से एक ही बार में जानवर का सिर काट लिया जाता था। प्रसिद्ध नवरात्रि पर्व के अन्तिम दिन अढ़ाई सौ भैसों तथा साढ़े चार हजार भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती थी।

विजयनगर की सामाजिक संरचना की तीन प्रकार की विशेषताएँ थी-

1. दक्षिण भारत के ब्राह्मणो की धर्म निरपेक्ष भूमिका- दक्षिण भारत के ब्राह्मण महत्त्वपूर्ण राजनैतिक पदों को सुशोभित करते थे। वे मंत्री, सेनानायक, दुर्ग रक्षक आदि पदों पर नियुक्त होते थे।

2. निचले सामाजिक समूहों में दोहरा विभाजन- निचले सामाजिक समूह दायाँ हाथ और बाएँ हाथ में विभाजित थे। दाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ वैष्णव होती थी और बाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ शैव होती थी। दाएँ हाथ से जुड़ी हुई जातियाँ कृषि उत्पादन तथा कृषि उत्पादों एवं स्थानीय व्यापार में संलग्न थीं जबकि बाएँ हाथ से जुड़ी जातियाँ गैर कृषि उत्पादन, व्यापार तथा शिल्प से संबद्ध थी।

3. समाज का क्षेत्रीय खंडीकरणः समाज के क्षेत्रीय खडीकरण से तात्पर्य समाज का प्राकृतिक उपक्षेत्रों में विभाजन अर्थात् एक क्षेत्र में निवास करने वाली जाति दूसरे क्षेत्र के उसी जाति से रक्त संबंध नहीं जोड़ पाती थी और इसी का स्वाभाविक परिणाम था कि दक्षिण में भाई-बहन और मामा-भांजी में वैवाहिक संबंध वर्जित थे। सुनारों, लोहारों एवं बढ़ईयों की हैसियत समाज में ऊँची थी, किन्तु जुलाहों एवं कुम्हारों का स्थान नीचा था।

श्रीरंग के शासन-काल में 1632 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने कुछ ग्रामों के निवासियों को आदेश दिया कि दस्तकार समुदायों में बढ़ई, लोहार और सुनार के साथ नहीं किया जाए और इसका उल्लंघन करने वालों पर 12 पण जुर्माना लाद दिया गया। तेलियों, कलालों और चमारों की हैसियत समाज में नीची थी। ब्राह्मण जाति सर्वप्रमुख जाति थी। क्षत्रियों के विषय में जानकारी प्राप्त नहीं होती। मध्य वर्गों में शेट्ठी या चेट्टी नामक एक बड़े समूह का उल्लेख मिलता है। चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले तथा दस्तकार वर्ग के लोग थे उन्हें वीरपंचाल कहा जाता था। इसके अतिरिक्त विप्र्विनोदन नामक एक जातीय श्रेणी थी, इसमें लोहार, स्वर्णकार और दस्तकार शामिल थे। कैकोल्लार (जुलाहे), कम्बलतर, शास्त्र्वाहक और गड़ेरिया नाइ और रेडी कुछ क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुदाय थे। इस काल में उत्तर भारत के बहुत सारे लोग दक्षिण भारत में बस गए थे। उन्हें बदव कहा जाता था। दक्षिण भारत के व्यापार को उन्होंने अपनाना शुरू किया। इसने एक प्रकार के सामाजिक विद्वेष को जन्म दिया।

कैकोल्लार (जुलाहे) मंदिरों की परिसीमा में भी रहते थे और मंदिर के प्रशासन एवं स्थानीय करारोपण में उनका बहुत बड़ा हाथ था। दूसरी तरफ डोम, जोगी और मछुआरों की सामाजिक स्थिति हेय थी। विजयनगर में दास प्रथा प्रचलित थी और दासों की खरीद बिक्री को बेसबग कहा जाता था।

स्त्रियो की स्थिति- स्त्रियो की स्थिति एक से अच्छी और बुरी दोनों थी। किन्तु कुल मिलाकर उनकी स्थिति निम्न ही थी। नूनिज के अनुसार, राजप्रसाद में रहने वाली महिलाओं में अनेक ज्योतिष, भविष्य वक्ता, संगीत और नृत्य में प्रवीण और राज्य की अंग रक्षिकायें भी होती थीं। इसके अतिरिक्त कुछ महिलायें कुश्ती लड़ती थीं और मल्ल युद्ध भी करती थीं।

विजयनगर में देवदासी की प्रथा प्रचलित थी। डोमिंगोपायस देवदासी प्रथा की सूचना देता है। इस काल में सती प्रथा का प्रमाण भी मिलता है। बारबोसा कहता है कि सती प्रथा शासक वर्ग में प्रचलित थी। 1534 ई. के एक अभिलेख में मालगौरा नामक एक महिला के सती होने का प्रमाण मिलता है। विजयनगर काल में वैश्या वृति भी प्रचलित थी। विजयनगर साम्राज्य में बाल-विवाह और दहेज प्रथा का भी प्रचलन था। विधवा व्यवस्था थी। परन्तु विधवा से विवाह करने वाले विवाह-कर से मुक्त कर दिये जाते थे। युद्ध वीरता दिखाने वाले पुरुषों को गंडप्रेद प्रदान किया जाता था जो सम्मान सूचक था। सांप्रदायिक विवादों के मामलों में भी राज्य का हस्तक्षेप होता था। श्रवणवेलगोल से प्राप्त एक अभिलेख में जैन एवं वैष्णव के विवाद में राज्य के हस्तक्षेप की चर्चा है।

कला और साहित्य: विजयनगर साम्राज्य

भारतीय कला संस्कृति और स्थापत्य के विकास की दृष्टि से विजयनगर साम्राज्य अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान भारतीय कला तथा संस्कृति का बहुआयामी विकास हुआ। इसे निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है-

विजयनगर साम्राज्य में कला एवं संस्कृति का विकास:
विजयनगर शासकों ने अपने दरबार में बड़े-बड़े विद्वानों एवं कवियों को स्थान दिया। इससे इस काल में साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। राजा कृष्णदेव राय एक महान विद्वान, संगीतज्ञ एवं कवि थें। उन्होंने तेलुगू भाषा में ‘अमुक्तमाल्यदा’  तथा संस्कृत में ‘जांबवती कल्याणम्’ नामक पुस्तक की रचना की। उनके राजकवि पद्दन ने ‘मनुचरित्र’ तथा ‘हरिकथा शरणम्’ जैसी पुस्तकों की रचना की। वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार ‘सायण’ तथा उनके भाई माधव विजयनगर के शासन के आरंभिक काल से संबंधित हैं। सायन ने चारों वेदों  पर टीकाओं की रचनाकार वैदिक संस्कृति को बढ़ावा दिया।

चित्रकला के क्षेत्र में ‘लिपाक्षी शैली’ तथा नाटकों के क्षेत्र में ‘यक्षगान’ का विकास हुआ। लिपाक्षी कला शैली के विषय रामायण एवं महाभारत से संबंधित हैं। 

विजयनगर के शासकों ने विभिन्न धर्मों वाले लोगों को प्रश्रय दिया।  बारबोसा ने कहा है-“राजा इतनी स्वतंत्रता देता है कि…… प्रत्येक व्यक्ति बिना इस पूछताछ के कि वह ईसाई है या यहूदी, मूर है या विधर्मी, अपने मत और धर्म के अनुसार रह सकता है।  इससे भारत में एक समावेशी संस्कृति के निर्माण को बढ़ावा मिला।

विजयनगर साम्राज्य में स्थापत्य का विकास: 
विजयनगर साम्राज्य  में संस्कृति के साथ-साथ कला तथा वास्तुकला की भी उन्नति हुई। कृष्णदेव राय ने हजारा एवं विट्ठल स्वामी मंदिर का निर्माण करवाया। ये मंदिर स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। मंडप के अलावा ‘कल्याण मंडप’ का प्रयोग, विशाल अलंकृत स्तंभों का प्रयोग तथा एकात्मक कला से निर्मित स्तंभ एवं मूर्तियाँ विजयनगर स्थापत्य की विशिष्टता को दर्शाते हैं। स्थापत्य कला की दृष्टि से विजयनगर किसी भी समकक्ष नगर से कमतर नहीं था। अब्दुल रज्जाक विजयनगर को विश्व में कहीं भी देखें या सुने गए सर्वाधिक भव्य एवं उत्कृष्ट नगरों में से एक मानता है। उसका कहना था की नगर इस रीति से निर्मित है कि सात नगर-दुर्ग और उतनी ही दीवारें एक दूसरे को काटती हैं। सातवां दुर्ग जो अन्य दुर्गों के केंद्र में स्थित है, का क्षेत्र विस्तार हिरात नगर के बाजार केंद्र से 10 गुना बड़ा है।  बाजारों के साथ-साथ राजा के महलों में तराशे हुए चिकने और चमकीले पत्थरों से निर्मित असंख्य बहती धाराएँ और नहरें देखी जा सकती थीं। ये विजयनगर स्थापत्य की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं।

स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति और स्थापत्य के विकास में विजयनगर साम्राज्य का अभूतपूर्व योगदान है।

संस्कृति के विकास के साथ कला एवं वास्तुकला की भी विलक्षण उन्नति हुई। इस साम्राज्य की पुरानी राजधानी के खंडहर संसार को यह घोषित करते हैं कि इसके गौरव के दिनों में स्वदेशी कलाकारों ने यहाँ वास्तुकला, मूर्तिकला एवं चित्रकला की एक पृथक् शैली का विकास किया था। माना जाता है कि दक्षिण में द्रविड़ शैली स्वतंत्र शैली के रूप में विकसित हुई थी और इस शैली में व्यापक निर्माण कार्य हुआ था। किन्तु मलिक काफूर के अधीन अलाउद्दीन की सेना ने दक्षिण के स्थापत्य को छत-नष्ट कर दिया। विजयनगर साम्राज्य हिन्दू नई उत्थानवादी पुनरुत्थान के आदर्श से जुड़ा हुआ था। माना जाता है कि बुक्का प्रथम ने संपूर्ण भारत के विद्वानों, हिन्दू, शिल्पकारों और कारीगरों को विजयनगर साम्राज्य में आमंत्रित किया था। द्रविड़ शैली के आधार पर ही विजयनगर साम्राज्य का स्थापत्य विकसित हुआ। इसकी विशेषतायें निम्नलिखित थी-

  1. मण्डप के अतिरिक्त कल्याण मण्डप का प्रयोग (इसमें देवताओं और देवियों का विवाह होता था)
  2. अलंकृत स्तम्भों का प्रयोग,
  3. एक ही चट्टान को काटकर स्तम्भ और जानवर की आकृति बनायी जाती थी, जिसमें सबसे स्पष्ट है दो पैरों पर खड़ा घोड़ा।

कृष्णदेवराय ने हजारा एवं विट्ठलस्वामी के मंदिर का निर्माण कराया। उन्होंने अम्बारम में तदापाती और पार्वती का मंदिर कांचीपुरम में बरदराज और एकम्बरनाथ के मंदिर का निर्माण कराया। लौंघर्स्ट कहता है कि कृष्णदेवराय के शासनकाल में बनाया गया प्रसिद्ध हजार मन्दिर विद्यमान हिन्दू मन्दिरों की वास्तुकला के पूर्णतया नमूनों में एक है। बिट्ठलस्वामी मन्दिर भी विजयनगर शैली का एक सुन्दर नमूना है। पगुसन के विचार में यह फूलों से अलंकृत उस वैभव की पराकाष्ठा का द्योतक है, जहाँ तक शैली पहुँच चुकी थी। चित्रकला उत्तमता की ऊँची सीढ़ी पर पहुँच गयी। यह चित्रकला लिपाक्षी कला कहलाती है। इसके विषय रामायण एवं महाभारत से लिये गए हैं। संगीतकला का शीघ्रता से विकास हुआ। संगीत के विषय पर कुछ नयी पुस्तकें लिखी गयीं। कृष्णदेवराय तथा संरक्षक (रीजेंट) रामराय संगीत में प्रवीण थे। नाट्यशालाओं से राज्य के लोगों का मनोरंजन होता था। यह यक्षणी शैली के नाम से जाना जाता है।

What are some amazing facts about the Vijaynagar empire and its capital? -  Quora

अभिलेखनीय तथा साहित्यिक प्रमाण स्पष्टत: बतलाते हैं कि विजयनगर के शासक धार्मिक प्रवृत्ति के तथा धर्म में अनुरक्त थे। पर वे धर्मोन्मत्त व्यक्ति नहीं थे। तत्कालीन चार सम्प्रदायों-शैव, बौद्ध, वैष्णव एवं जैन-तथा विदेशी धर्मों-ईसाई, यहूदी एवं मूरिश (इस्लाम) तक के प्रति उनका रुख उदारता पूर्ण था। बारबोसा लिखता है- राजा ऐसी स्वतंत्रता देता है कि प्रत्येक मुनष्य बिना किसी खीझ और जाँच-पड़ताल के, कि वह ईसाई, यहूदी, मूर (मुस्लिम) अथवा हिन्दू है, अपने धर्म के अनुसार कहीं भी आ-जा तथा रह सकता है।

शासन व्यवस्था: विजयनगर साम्राज्य

राजा का पद सवाँच्च था। वह दिग्विजय की उपाधि धारण करता था। विजयनगर-साम्राज्य में धीरे-धीरे एक केन्द्रमुखी शासन का विकास हुआ, जिसकी सभी शाखाएँ सावधानी से संगठित थीं। इसमें सन्देह नहीं कि जैसा काम इसके शासकों ने अपने ऊपर लिया था उसके लिए उन्हें एक प्रबल सेना रखना तथा सैनिक आक्रमण भी करना पड़ा, पर उनके राज्य का वर्णन शक्ति पर आधारित मुख्यतः सैनिक राज्य के रूप में करना तथा उसे एक ऐसा संगठन, जिसमें “विकास का कोई सिद्धांत न था,……मानव-प्रगति का कोई आदर्श न था और इसलिए टिकाऊपन न आ सका, कहकर उसे कलंकित करना है, जैसा कि एक आधुनिक लेखक ने किया है, सही नहीं मालूम पड़ता। सच बात तो यह है कि साम्राज्य-विस्तार के साथ इसके शासकों ने शासन का संगठन इस कार्यक्षमता से किया कि जिससे युद्धकाल में फैली हुई अव्यवस्था का अन्त हो गया तथा विभिन्न क्षेत्रों में शान्तिपूर्ण कार्य करना सुगम हो गया।

अन्य मध्यकालीन सरकारों की तरह, विजयनगर-राज्य में राजा समस्त शक्ति का स्रोत था। वह नागरिक, सैनिक तथा न्याय-सम्बन्धी मामलों में सर्वोच्च अधिकारी था तथा प्राय: सामाजिक झगड़ों को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप भी किया करता था। पर वह अनुत्तरदायी निरंकुश शासक नहीं था, जो राज्य के हितों की अवहेलना करता और लोगों के अधिकारों एवं इच्छाओं की उपेक्षा करता । विजयनगर के राजा लोगों की सद्भावना प्राप्त करना जानते थे। अपनी उदार नीति से उन्हेने राज्य में शान्ति एवं समृद्धि लाने में सहायता दी। कृष्णदेवराय अपनी आमुक्तमाल्यदा में लिखता है कि एक मूर्धाभिषिक्त राजा को सर्वदा धर्म की दृष्टि में रखकर शासन करना चाहिए। वह आगे कहता है कि राजा को अपने पास राजकाज में कुशल लोगों को एकत्रित कर राज्य करना चाहिए, अपने राज्य में बहुमूल्य धातुएँ देने वाली खानों का पता लगाकर (उनसे) धातुओं को निकालना चाहिए, अपने लोगों से परिमित रूप में कर वसूल करना चाहिए, मैत्रीपूर्ण होना चाहिए, अपनी प्रत्येक प्रजा की रक्षा करनी चाहिए, उनमें जाति-मिश्रण का अन्तर कर देना चाहिए, सर्वदा ब्राह्मणों का गुणवद्धन करने का प्रयत्न करना चाहिए, अपने दुर्ग को प्रबल बनाना चाहिए और अवांछनीय वस्तुओं की वृद्धि को कम करना चाहिए तथा अपने नगरों को शुद्ध रखने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए।शासन के कार्य में राजा द्वारा नियुक्त एक मंत्रिपरिषद् उसकी सहायता करती थी। इसमें 20 सदस्य होते थे। मंत्रियों की बैठक एक हॉल में होती थी जिसे वेंकटविलासमानप कहा जाता था। प्रधानमंत्री को प्रधानी एवं मत्रियों को दण्डनायक कहा जाता था। यद्यपि ब्राह्मणों को शासन में ऊँचे पद प्राप्त थे तथा उनका काफी प्रभाव था तथा मंत्री केवल उनके वर्ग से ही नहीं, बल्कि क्षत्रियों एवं वैश्यों के वगों से भी भर्ती किये जाते थे। मंत्री का पद कभी-कभी वंशानुगत तथा कभी-कभी चुनाव पर निर्भर था। राजा परिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था। कभी-कभी महत्त्वपूर्ण मंत्रियों को भी दण्डित किया जाता था। जब सालुवतिम्मा पर युवराज की हत्या का शक हुआ तो कृष्णदेवराय द्वारा उसे दण्ड दिया गया। अब्दुर्रज्जाक तथा नूनिज दोनों ही एक प्रकार के सचिवालय के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं जिसमें रायसम (सचिव) एवं कर्णिम (लेखापाल) होते थे। रायसम नामक अधिकारी राजा के मौखिक आदेशों को अभिलेखित करता था। राज्य व्यवस्था सप्तांग विचारधारा पर आधारित थी। मंत्रियों के अतिरिक्त राज्य के अन्य अधिकारी थे- प्रमुख कोषाध्यक्ष, जवाहरात के संरक्षक, राज्य के व्यापारिक हित की रक्षा करने वाला अधिकारी, पुलिस का अधिकारी जिसका काम अपराधों को रोकना तथा नगर में व्यवस्था बनाये रखना था, अश्व का प्रमुख अध्यक्ष तथा अन्य छोटे अधिकारी, जैसे राजा के स्तुति-गायक भाट, तांबूल-वाही अथवा राजा के व्यक्तिगत सेवक, दिनपत्री प्रस्तुत करने वाले, नक्काशी करने वाले तथा अभिलेखों के रचयिता।

नायंकर व्यवस्था- विजयनगर साम्राज्य की विशिष्ट व्यवस्था नायंकर व्यवस्था थी। साम्राज्य की समस्त भूमि तीन भागों में विभाजित थी।

  1. भण्डारवाद भूमि- यह भूमि राजकीय भूमि होती थी और इस प्रकार की भूमि कम थी।
  2. समरन् भूमि- दूसरे प्रकार की भूमि समरन् भूमि कहलाती थी। यह भूमि सैनिक सेवा के बदले अमरनायकों और पलाइगारों को दी जाती थी। इस प्रकार की भूमि अधिक थी। इस प्रकार की भूमि कुल भूमि का 3/4 भाग थी किन्तु यह भूमि वंशानुगत नहीं थी।
  3. मान्या भूमि- तीसरे प्रकार की भूमि मान्या भूमि होती थी। यह भूमि ब्राह्मणों, मंदिरों या मठों को दान में दी जाती थी।

पुर्तगाली लेखक नूनिज और पायस ने नायंकर व्यवस्था का अध्ययन किया है। उनके विचार में नायक बड़े-बड़े सामंत होते थे। इन नायकों को केन्द्र में दो प्रकार के संपर्क अधिकारी रखने पड़ते थे। इनमें से एक अधिकारी राजधानी में स्थित नायक की सेना का सेनापति होता था और दूसरा सम्बन्धित नायक का प्रशासनिक एजेण्ट होता था, जिसे स्थानापति कहा जाता था। आगे चलकर नायंकार व्यवस्था के कारण विजयनगर साम्राज्य कमजोर पड़ गया। नायकों पर नियंत्रण के लिए महामंडेलेश्वर या विशेष कमिश्नरों की नियुक्ति की जाती थी। पहली बार इसकी नियुक्ति अच्युतदेवराय के समय हुई।

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